बिलासपुर: छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, लोकगीत और पारंपरिक कला की सुगंध से सराबोर 36वां बिलासा महोत्सव इस वर्ष भी पूरे उत्साह और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। दो दिनों तक चले इस आयोजन में लोकगीत, नृत्य, प्रहसन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। स्थानीय लालबहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित महोत्सव में हजारों दर्शकों ने लोक संस्कृति का जीवंत दर्शन किया।
कार्यक्रम की शुरुआत ईष्ट देवों की आराधना के साथ हुई। इसके बाद सिरगिट्टी के वीएम स्कूल के छात्रों ने अपनी शानदार प्रस्तुति से महोत्सव का आगाज किया और दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।
मंच के संस्थापक डॉ. सोमनाथ यादव ने बताया कि बिलासा कला मंच पिछले 36 वर्षों से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को आम जनता तक पहुंचाने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि हरेली तिहार, अरपा बचाओ अभियान, शरदोत्सव, मूर्खाधिराज अभिषेक और ग्रामीण शिविर जैसे आयोजनों के माध्यम से मंच लगातार लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास करता रहा है। उन्होंने कहा कि बिलासपुर की जनता के प्रेम और सहयोग की वजह से यह आयोजन इतने वर्षों से लगातार सफलतापूर्वक हो पा रहा है।
मुख्य अतिथि अमर अग्रवाल, विधायक बिलासपुर, ने कहा कि बिलासा महोत्सव की पहचान अब पूरे छत्तीसगढ़ में बन चुकी है। यहां स्थानीय और अंतरराज्यीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है, जो इस मंच की खासियत है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव ने कहा कि यह आयोजन बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है और नए कलाकारों को भी आगे आने का मंच देता है।
महोत्सव के दौरान कई कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सम्मानित भी किया गया। बिलासा साहित्य सम्मान से नंदराम यादव (मुंगेली) और बसंत साव (रायगढ़), बिलासा कला सम्मान से हिमानी वासनिक (राजनांदगांव) और मंजू श्रीवास (रायपुर) तथा बिलासा सेवा सम्मान से ईश्वर श्रीवास व उनकी सेवा टीम (जोंधरा), चंचल सलूजा और धनंजय सिंह को सम्मानित किया गया।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देउरगांव साजा से आए गौतम चौबे की टीम ने “महतारी के कोरा, महतारी के पीरा” प्रहसन प्रस्तुत कर दर्शकों को खूब हंसाया और सामाजिक संदेश भी दिया। बिलासपुर के रामावतार चंद्राकर की टीम ने “रंगझाझर” कार्यक्रम से खूब वाहवाही लूटी। राजनांदगांव की लोकगायिका हिमानी वासनिक ने भरथरी गीतों से माहौल को संगीतमय बना दिया, वहीं प्रसिद्ध लोकगायिका कविता वासनिक ने “पता ले जा रे” गीत गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ सराफा एसोसिएशन के प्रांताध्यक्ष कमल सोनी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि बिलासा महोत्सव में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का अनूठा दर्शन होता है और बिलासपुर के लोगों का प्रेम ही इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत है।
समापन अवसर पर लोकगायिका रेखा देवार ने अपने साथियों के साथ देवार गीत-नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद बालोद से आए लोककलाकार संजू सेन और उनकी टीम ने एक साथ 50 से अधिक वाद्ययंत्र बजाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। उन्होंने मादरी और आंगा देव नृत्य भी प्रस्तुत किया। रायपुर से आई प्रभा कटारे और उनकी टीम ने बारहमासी गीत, करमा-ददरिया और आदिवासी नृत्य से मंच पर रंग जमा दिया, जबकि लिमहागढ़ के कलाकारों ने करमा नृत्य से सभी का दिल जीत लिया।

महोत्सव के दौरान सुरेश सिंह बैस की पुस्तक “बोलती परछाइयां” तथा महेश श्रीवास की यात्रा संस्मरण पुस्तक “अरपा से अलास्का तक” का भी विमोचन किया गया।
कार्यक्रम का संचालन महेश श्रीवास, रश्मि गुप्ता और महेंद्र ध्रुव ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन चंद्रप्रकाश देवरस और रामेश्वर गुप्ता ने किया। दो दिनों तक चले इस सांस्कृतिक महोत्सव में शहर के बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और कला प्रेमी उपस्थित रहे और छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का भरपूर आनंद लिया।
इस अवसर पर मंच के अध्यक्ष महेश श्रीवास,डॉ सुधाकर बिबे,डॉ अजय पाठक,डॉ भगवती प्रसाद चंद्रा, चंद्रप्रकाश बाजपेयी,राघवेंद्रधर दीवान,डॉ देवधर महंत,राजेंद्र मौर्य,रामेश्वर गुप्ता, यश मिश्रा,दिनेश्वर राव जाधव, देवानंद दुबे,अश्विनी पांडे,नरेंद्र कौशिक, अनिल व्यास, कैलाश अग्रवाल,मनीष गुप्ता,महेंद्र गुप्ता, अनूप श्रीवास,केवलकृष्ण पाठक,डॉ जी.डी. पटेल,सुधीर दत्ता, जसबीर गुम्बर,आनंदप्रकाश गुप्ता,एम डी मानिकपुरी,ओमशंकर लिबर्टी, प्रदीप कोशले, बद्री केंवट,अनिल व्यास,श्यामकार्तिक,गोपाल यादव, नीरज यादव,रामायण सूर्यवंशी,शरद यादव,दिनेश लसहे,शत्रुघ्न जैसवानी, रवि भोई, विजय गुप्ता सहित शहर के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

