दो दिवसीय “बाल विशेष सेवाएं” प्रशिक्षण में विशेषज्ञों ने बताए पुनर्वास के उपाय।
बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए समाज, संस्थानों और सरकार की संयुक्त भूमिका जरूरी।
बिलासपुर। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग में “बाल विशेष सेवाएं” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत 26 मार्च 2026 को हुई। यह कार्यक्रम सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार (एनआईएसडी), नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का मुख्य विषय भिक्षावृत्ति में संलग्न बच्चों के लिए विशेष सेवाएं रहा।
कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल ने कहा कि भिक्षावृत्ति अब केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि कई जगह यह एक संगठित व्यवस्था का रूप ले चुकी है। यह स्थिति समाज की संवेदनशीलता और विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि समाज, शैक्षणिक संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और जागरूक नागरिकों की संयुक्त भागीदारी जरूरी है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भिक्षावृत्ति को दान की नजर से नहीं, बल्कि पुनर्वास और सशक्तिकरण के रूप में देखना चाहिए। शिक्षा और कौशल विकास के जरिए ही जरूरतमंदों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलसचिव प्रो. ए.के. दीक्षित ने कहा कि भिक्षावृत्ति जैसी चुनौती का समाधान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से संभव है।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की भूमिका जागरूकता फैलाने और सामाजिक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण होती है।

विशिष्ट अतिथि डॉ. सोमनाथ यादव (पूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग) ने कहा कि बाल भिक्षावृत्ति के पीछे गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता जैसे कई कारण हैं। इसका समाधान तभी संभव है जब हम प्रभावित परिवारों तक पहुंचकर उनकी मूलभूत जरूरतों शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करें।

वहीं, डॉ. विनय कुमार पाठक (राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद एवं पूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग) ने कहा कि शिक्षा ही इस समस्या का स्थायी समाधान है। शिक्षा बच्चों को जागरूक बनाकर उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का रास्ता दिखाती है। उन्होंने समाज में संवेदनशीलता बढ़ाने की भी जरूरत बताई।

कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विशेषज्ञों ने छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षण दिया। इसमें भिक्षावृत्ति में संलिप्त बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के उपायों पर गंभीर चर्चा हुई। सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी विस्तार से समझाया गया। विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने के व्यावहारिक तरीके बताए और जिम्मेदारी के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

इस अवसर पर जिला बाल संरक्षण अधिकारी सत्यनारायण राठौर, संरक्षण अधिकारी (संस्थागत देखभाल) राहुल पवार, अधिवक्ता हाईकोर्ट बिलासपुर दिव्या जायसवाल, विधि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. सुधांशु मोहपात्रा, राज्य सलाहकार महिला एवं बाल विकास विभाग सारवत नकवी, सहायक प्राध्यापक (शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर) डॉ. अनुष्का आत्राम विशेष रूप से उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. आर.के. प्रधान के स्वागत उद्बोधन से हुई। इस दौरान समाज कार्य विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना यादव द्वारा लिखित पुस्तक “लीडरशिप इन एकेडेमिया” और “हौसला: एक विश्वविद्यालय की उत्कर्ष की कहानी” अतिथियों को भेंट की गई। अतिथियों का शॉल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया गया।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अर्चना यादव ने दिया, जबकि कार्यक्रम का संचालन डॉ. मोहिनी गौतम ने किया। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के अधिष्ठाता, शिक्षक, अधिकारी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


