बिलासपुर। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के सदाबहार गीत जब सुरों में ढले, तो लखीराम ऑडिटोरियम में यादों की महफिल सज उठी। शनिवार की शाम आयोजित संगीतमय कार्यक्रम ‘नॉस्टेल्जिया’ में शास्त्रीय गायिका श्रुति प्रभला ने 19 कालजयी गीतों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को पुराने दौर की यादों में पहुंचा दिया। ‘हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे’ की भावभूमि पर सजे इस आयोजन में प्रेम, विरह और भावनाओं से भरे गीतों ने समां बांध दिया। ‘बावरा मन’ और ‘श्लोक-ध्वनि फाउंडेशन’ के संयुक्त आयोजन का समापन ‘अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं’ गीत के साथ हुआ। इस प्रस्तुति ने संगीत संध्या को यादगार बना दिया।

कार्यक्रम की खासियत केवल सदाबहार गीतों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे शास्त्रीय संगीत को समझाने का अंदाज भी रहा। श्रुति प्रभला ने ‘दिल ढूंढता है’ में राग बिहाग, ‘चैन से हमको कभी’ में यमन कल्याण, ‘लग जा गले’ में पहाड़ी और ‘हम तेरे प्यार में सारा आलम’ में राग देश की विशेषताओं को सहज भाषा में समझाया। मुख्य गीत से पहले संबंधित राग पर आधारित दूसरे लोकप्रिय गीतों की पंक्तियां सुनाकर उन्होंने फिल्मी संगीत और शास्त्रीय रागों के बीच का संबंध भी श्रोताओं के सामने रखा।
‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा’, ‘ये रातें ये मौसम, नदी का किनारा’ और ‘एक प्यार का नगमा है’ जैसे गीतों ने माहौल को भावुक बना दिया। श्रुति प्रभला की गायकी में सुरों की शुद्धता और भावनाओं की गहराई का मेल दिखाई दिया। हर गीत के साथ श्रोता पुराने समय की यादों में खोते नजर आए।

संगीत संध्या में वाद्य-संगत ने भी खास रंग भरे। भोपाल से आए अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वायलिन वादक मनोज कुमार ने अपनी मधुर धुनों से गीतों की संवेदनाओं को और गहराई दी। तबले पर शाहनवाज हुसैन की सधी हुई थाप, सिंथेसाइजर पर शाहिद मासूम का संगीत संयोजन और ऑक्टोपैड पर पीटर मुदलियार की लयकारी ने प्रस्तुतियों को प्रभावशाली बनाया।
कार्यक्रम का संचालन विवेक जोगलेकर ने रोचक अंदाज में किया। गीतों, फिल्मों, गायकों और गीतकारों से जुड़े दिलचस्प संदर्भों के जरिए उन्होंने श्रोताओं की दिलचस्पी बनाए रखी। कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की दीप प्रज्ज्वलन और कलाकारों के सम्मान के साथ हुई। ‘बावरा मन’ के सचिव राजेश दुआ ने स्वागत किया, जबकि ‘श्लोक-ध्वनि फाउंडेशन’ के श्रीकुमार ने आभार व्यक्त किया।

श्रुति प्रभला ने कहा कि ‘नॉस्टेल्जिया’ केवल पुराने गीतों को प्रस्तुत करने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी भावनाओं को दोबारा जीने की कोशिश है। संगीत संध्या ने एक बार फिर एहसास कराया कि कालजयी गीत समय के साथ अपनी चमक नहीं खोते। वे यादों, भावनाओं और सुरों के सहारे हर पीढ़ी के दिल में अपनी जगह बनाए रखते हैं।

